बीजिंग का वो खूनी चौक, जहां चीन ने 10 हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भून दिया था

बीजिंग का वो खूनी चौक, जहां चीन ने 10 हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भून दिया था

पहले भी चीन लोकतंत्र का दमन करता रहा है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल थियानमेन चौक नरसंहार (Tiananmen Square Massacre) है

हांगकांग (Hong Kong) को दबाने के लिए चीन जो पैतरे अपना रहा है, वो नए नहीं. पहले भी चीन लोकतंत्र का दमन करता रहा है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल थियानमेन चौक नरसंहार (Tiananmen Square Massacre) है, जब हजारों स्टूडेंट्स और युवा समर्थकों को गोलियों से भून दिया गया था.

चीन अब हांगकांग (Hong Kong) की सुरक्षा के नाम पर नया कानून लाने वाला है. ये कानून देशद्रोह, अलगाववाद और तोड़फोड़ रोकने की आड़ लेकर लाया जा रहा है लेकिन इसका असल मकसद कुछ और है. हांगकांग के लोकतंत्र समर्थकों का कहना है कि चीन (China) इस कानून का सहारा लेकर उनकी आवाज खत्म कर देना चाहता है. अब ये डर भी पनप रहा है कि कहीं चीन युवाओं को रोकने के लिए लगभग 30 साल पुराने अंदाज में आकर थियानमेन चौक नरसंहार (tiananmen square massacre) वाला रास्ता न अपना ले. जानिए, क्या है इसकी कहानी.

साल 1989 के अप्रैल में चीन में लोकतंत्र के समर्थन में काफी बड़ा आंदोलन हुआ. इसमें अधिकतर छात्र-छात्राएं ही शामिल थे. वे महंगाई, कम वेतन और घर चलाने को लेकर समस्याएं बता रहे थे. ये प्रदर्शन लगभग 6 हफ्ते तक चला, जिसमें धीरे-धीरे लोग जुड़ते चले गए गए और लगभग 10 लाख से ज्यादा लोग इकट्ठा हो गए. राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर हुए इस आंदोलन पर गुस्साई सरकार ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए मार्शल लॉ लगाया. ये तीन जून की बात है. इसी रात सुरक्षाबल टैकों के साथ पहुंचे और आंदोलनकारियों पर गोलियों की बौछार करवा दी. यहां तक कि टैंकों से भी गोलाबारी की गई थी. इससे आंदोलन करने वालों में भगदड़ मच गई. सैकड़ों लोग दबने की वजह से तो हजारों गोलियों से मारे गए.

मारे गए लोगों के बारे में जून 1989 में चीन ने बताया कि दंगे रोकने के दौरान 200 लोग मारे गए

ब्रिटिश राजदूत ने खोला राजतब चीन ने नरसंहार का कोई ब्यौरा नहीं दिया था, बल्कि कहा था ये कि एक जरूरी कदम था. मारे गए लोगों के बारे में जून 1989 में चीन ने बताया कि दंगे रोकने के दौरान 200 लोग मारे गए और दर्जनों पुलिसवाले घायल हो गए. हालांकि तब वहीं मौजूद ब्रिटिश राजदूत एलन डोनाल्ड ने एक टेलीग्राम लंदन भेजा. इसमें डोनाल्ड ने साफ लिखा था कि कम से कम 10 हजार लोग मारे गए. ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्ज में रखा ये दस्तावेज 28 सालों बाद सार्वजनिक हुआ, तब जाकर दुनिया को मारे गए लोगों की संख्या का अंदाजा हो सका.

है कड़ी सेंसरशिप
हालांकि चीन में अब भी सरकार का पूरा अमला इस नरसंहार की याद तक को छिपाने में लगा रहता है. जैसे ही 3 जून आता है, सैकड़ों सरकारी मीडिया संस्थान इसपर एक्टिव हो जाते हैं कि कहीं भी, किसी सोशल मीडिया पर भी इस नरसंहार की याद न आ जाए. भारी सेंसरशिप चलती है. यहां तक कि बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान 10 हजार से ज्यादा लोग इस काम में लगाए जाते हैं कि वे इंटरनेट पर नरसंहार से जुड़ी किसी भी सामग्री को हटाते जाएं. अब भी इस पर चीन में किसी तरह की बात या बहस पर मनाही है.

चीन में अब भी सरकार का पूरा अमला इस नरसंहार की याद तक को छिपाने में लगा रहता है

क्यों डरता है चीन
निर्मम नरसंहार की खबर को चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने छिपाने की खूब कोशिश की. तब इंटरनेट भी नहीं था लेकिन इसके बाद भी इसकी खबर तुरंत ही दुनियाभर में फैल गई. तब सारी दुनिया ने चीन की सरकार की आलोचना की थी और लंबे समय तक चीन से कोई आयात-निर्यात रुका हुआ था. यही वजह है कि चीन अब भी नहीं चाहता कि कोई भी उस चौक को याद दिलाए. आजतक के अनुसार टोरेंटो यूनिवर्सिटी ने कहा था कि चीन की सरकार ने इस घटना से जुड़े 3000 से भी ज्यादा सबूत मिटा दिए हैं और विदेशी मीडिया को उस चौक पर जाने की इजाजत नहीं है.

क्या है इस चौक का इतिहास
थियानमेन का मतलब है स्वर्गीय शांति का द्वार. पहले ये खेल का मैदान हुआ करता था. बाद में साल 1911 में चीन के आखिरी बादशाह को हटाए जाने के बाद से इस मैदान पर राजनैतिक काम-धाम होने लगे. हालांकि तब तक भी ये राजधानी बीजिंग के दूसरे मैदानों से अलग नहीं था. इसके अलग दर्जा मिला साल 1949 में. उसी साल काफी संघर्ष के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने देश को संभाला था. और इसी थियानमेन चौक पर माओ ने चीनी रिपब्लिक का एलान किया. धीरे-धीरे राजनैतिक रंग के कारण मैदान का आकार बढ़ता गया. अब यहां 6 लाख से ज्यादा लोग आराम से जमा हो सकते हैं.

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First published: May 23, 2020, 3:12 PM IST



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